नवरस

कविताओं को पौराणिक संस्कृत शास्त्र नाट्य शास्त्र की विधाओं के अनुरूप श्रेणियों में बांटा गया है।

यादों के झरोखे से

वो कंगन, वो मेहंदी, वो काजल, वो बिंदी \ वो आँखों के आँसू, वो नज़रों का जादू \ वो रूठना-मनाना, वो खतों का ज़माना \ वो छिप्प-छिप्प कर मिलना, वो झूठा बहाना \ बहुत याद आता है, गुज़रा ज़माना।

हाँ कभी-कभी तुम्हें सोच लिया करता हूँ

दोस्तों से तुम्हारा हाल-चाल लिया करता हूँ। \ कुछ पुराने फोटो तुम्हारे देख लिया करता हूँ॥ \ तुम्हारी पसंद-नापसंद अब भी याद है मुझको। \ हाँ कभी-कभी तुम्हें सोच लिया करता हूँ॥

बेटी को बढ़ाओ – पर तब, जब बचा सको

बेटा बेटी में अब कोई फर्क नहीं, ये कहते लोग नहीं थकते, \ फिर आए दिन उन पर हो रहे अत्याचार क्यों नहीं थमते?

मौन मुखरित हो गया है

लाठी कहीं टूटी पड़ी है \ गोद में रुलाई जड़ी है, \ सूनी और पथराई आँखें \ द्वार पर कब से खड़ी हैं, \ घर के कोने-कोने में अब, \ शोक बिम्बित हो गया है, \ मौन मुखरित हो गया है।

एक प्रहरी

जब दिवाली के दीये हैं जलते, \जब होली के रंग बिखरते। \जब ईद की सेवइयों की खुशबू है महकती, \जब मस्जिद से अज़ान है चहकती। \उस वक़्त सरहदों पे खड़ा बनके मैं ढाल हूँ, \हाँ मैं एक प्रहरी हूँ दुश्मन का मैं काल हूँ।

मैं प्रतिबद्ध हूँ

जेठ की लू में, \ अमिया के खट्टे रस में, \ माँ के तेल में भीगे हाथों से उलझते केश… \ और उनके नीचे दिमाग़ में इठलाते \ उन सपनों के लिए, \ मैं प्रतिबद्ध हूँ।

ख़ुद पर यकीन

जो चाहोगे वो सब पाओगे \ जब तुमको ख़ुद पर यकीन हो। \ बस केवल ख़्वाब ही नही \ हकीकत की भी ज़मीन हो।

यार दोस्त

याद आते हैं वो दिन जब यारों के साथ वक़्त बिताया करते थे \ कुछ उनकी सुनते थे कुछ अपनी सुनाया करते थे \ कभी खिलखिलाते थे तो कभी आँसू बहाया करते थे \ अपनी पढ़ाई छोड़ कर उनको पढ़ाने जाया करते थे

बस यूं ही

ख़ुद से ख़ुद-ब-ख़ुद दूर होना है \ तुम्हारी बंदिशों से आज़ाद होना है \ आजिज़ आ चुके हैं तुम्हें ख़ुद में ढूंढते हुए \ पिंजरे से निकल कर इस परिंदे को अब \ दूर आसमान में कहीं खोना है

बेटी एक वरदान

एक मुस्कुराहट भर से ही हर ग़म मिटा देती हैं बेटियां \ आंखों की चमक से ही हर दिन रोशन कर देती हैं बेटियां

बचपन

... क्यूंकी बचपन सब में छुपा है \ बस सबको उसे जीने का बहाना नहीं मिलता \ हर किसी को फिर वो मौसम सुहाना नहीं मिलता

परिवार

कहने को तो सब अलग से लगे हैं \ पर सच मैं कहूं तो सब मिलकर खड़े हैं … \ अगर एक रूठे तो दूजा मनाये \ बड़े माफ कर दें गर गलती हो जाये …

छपाक

लो मान लिया मैने कि उसको प्यार था मुझसे मगर जो उसने किया क्या वो प्यार मे होता है

सामाजिक प्राणी

कल के अखबार में पढ़ लेंगे ये खबर, \ यही है आज की मानसिकता। \ और फिर किसको हो परवाह, \ वो कोई अपना थोड़ी न था … \ गर्व करो की हम सामाजिक प्राणी है।

दशहरा

रावण लाख बुरा सही पर घबराता तो था \ सीता को बिन मर्जी छूने से कतराता तो था \ ख़ता एक बार हुई थी चलो अब भूल भी जाएँ \ क्यों न अब एक नयी तरह से दशहरा मनाएँ

राम और रावण

कौन है रावण कौन राम है \ बतलाता सिर्फ किया काम है \ मैं नहीं कहती अच्छाई नहीं है \ पर कोई तो कह दे बुराई नहीं है

बेटी को बढ़ाओ – पर तब, जब बचा सको

बेटा बेटी में अब कोई फर्क नहीं, ये कहते लोग नहीं थकते, \ फिर आए दिन उन पर हो रहे अत्याचार क्यों नहीं थमते?

कुछ तो लोग कहेंगे

कोई कहता है तुम छोटे हो \ कोई कहता है तुम मोटे हो \ पर कोई इनसे पूछे \ ये कहने वाले तुम कौन होते हो?

बेटी को बढ़ाओ – पर तब, जब बचा सको

बेटा बेटी में अब कोई फर्क नहीं, ये कहते लोग नहीं थकते, \ फिर आए दिन उन पर हो रहे अत्याचार क्यों नहीं थमते?
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